बिलासपुर एमआईजी-86, फेस नं.2, आर.पी. नगर, कोरबा निवासी के. के. पाण्डेय कार्यालय पुलिस अधीक्षक, कोरबा में निरीक्षक (इन्सपेक्टर) अ के पद पर पदस्थ थे। उक्त पदस्थापना के दौरान उन्हें पुलिस अधीक्षक, कोरबा द्वारा एक आपराधिक मामले के समंस/वारंट तामीली में लापरवाही के आरोप में कारण बताओं नोटिस जारी किया गया एवं निरीक्षक के. के. पाण्डेय द्वारा कारण बताओं नोटिस का दिए गए जवाब से असंतुष्ट होकर पुलिस अधीक्षक (एसपी) कोरबा द्वारा उन्हे “एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए असंचयी प्रभाव से रोके जाने” के दण्ड से दण्डित किया गया। उक्त दण्डादेश से क्षुब्ध होकर निरीक्षक (अ) के. के. पाण्डेय द्वारा हाईकोर्ट अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय एवं ऋषभदेव साहू के माध्यम से हाईकोर्ट बिलासपुर के समक्ष रिट याचिका दायर कर दण्डादेश को चुनौती दी गई। अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय एवं ऋषभदेव साहू द्वारा हाईकोर्ट के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लाल औधराज सिंह लाल रामप्रताप सिंह विरूद्ध मध्यप्रदेश शासन, ओ. के. भारद्वाज विरूद्ध यूनियन ऑफ इण्डिया एवं अन्य के मामले में दिए गए न्यायनिर्णय इसके साथ ही छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 16 (1) एवं 16 (2) में यह प्रावधान है कि यदि किसी शासकीय अधिकारी/कर्मचारी के विरुद्ध किन्ही आरोपों पर कारण बताओं नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाता है और उक्त अधिकारी/कर्मचारी उसके ऊपर लगाये गए आरोपों से पूर्णतः इंकार करता है, और यदि अनुशासनात्मक प्राधिकारी उक्त शासकीय अधिकारी / कर्मचारी को लघु दण्ड (छोटी सजा) से दण्डित करना चाहता है। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक अधिकारी को पूर्ण कारण दर्शाते हुए उक्त अधिकारी/कर्मचारी के विरूद्ध आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच किया जाना अनिवार्य है. परन्तु याचिकाकर्ता के मामले में पुलिस अधीक्षक (एसपी) कोरबा द्वारा बिना कोई आरोप पत्र जारी किये एवं बिना विभागीय जांच के याचिकाकर्ता को लघु दण्ड “एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए असंचयी प्रभाव से रोके जाने” के दण्ड से दण्डित किया गया। उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा उक्त रिट याचिका को स्वीकार कर याचिकाकर्ता के विरूद्ध पारित लघु दण्डादेश को निरस्त कर दिया।

