बिलासपुर,छत्तीसगढ़ के माटी म सुआ नाच के अपन अलग पहिचान हे। ये नाच सिरिफ मनोरंजन के साधन नइ हे, बल्कि हमर लोकसंस्कृति, परंपरा अउ नारी मन के भावन मन के अभिव्यक्ति आय।
लोकपरंपरा ल बचाय राखय बर सुआ नाच हमर पुरखा मन के दिए गे सांस्कृतिक धरोहर आय, जेखर ले हमर छत्तीसगढ़ के लोककला आज घलो जीवित हे।
सुख-समृद्धि अउ हरियर फसल के कामना बर गाँव के महिला मन सुआ नाच के माध्यम ले अपन जिनगी म सुख, शांति अउ समृद्धि के कामना करथें।
अपन मन के भाव ल जताय बर सुआ गीत म मया, बिरह, पीरा, अपन मइके के सुरता अउ जिनगी के अलग-अलग रंग देखय -सुनय ल मिलथे।
हमर छत्तीसगढ़ म अपन संस्कृति के पहिचान बर टुकनी म राखय सुआ (पड़की,तोता )के चारों मुड़ा गोल घेरा बनाके महिला मन समूह म घर-घर जाके एक ताली के लय म नाचथें अउ गीत ल गाथय । सुआ अपन मन के बात ला दूसर तक पहुँचाय के एक सुंदर प्रतीक आय। येखर ले आपसी मेल मिलाप के संग म गाँव म आपसी एकता बाढ़थे।
सुआ नाच हमर छत्तीसगढ़ के माटी के ओ सुगंध आय जेऊन महिला मन के भावना अउ पुरखा मन के परंपरा ला प्रतीक रूप बगराय जाथे । येखर ले हमन अपन संस्कृति ल अपन पीढ़ी तक पहुँचाथन।