बिलासपुर राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा ने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा विधानसभा के बजट सत्र में एक नया एवं कठोर धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पारित करने की योजना की सूचना प्राप्त हुई है।
छत्तीसगढ़ में पहले से ही मध्य प्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968, प्रदेश विभाजन के बाद लागू है। जिसका व्यापक दुरुपयोग ईसाई समुदाय को प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है। इस अधिनियम का इस्तेमाल धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर ईसाई समुदाय के खिलाफ हथियार के रूप में किया जा रहा है, जिसमें “जबरन धर्मांतरण के निराधार आरोपों के कारण गिरफ्तारियां, चचों को बंद करना, सामाजिक बहिष्कार, अंतिम संस्कार पर प्रतिबंध, बलपूर्वक विस्थापन और हिंसा जैसी घटनाएं हो रही हैं।
झूठे आरोप लगने के बाद निदर्दोष व्यक्ति को जमानत, कोर्ट-कचहरी की दौड़भाग तथा शुकदमेबाजी में वर्षों तक आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित होना पड़ता है।
प्रस्तावित नया विधेयक पुलिस और प्रशासन की शक्त्तियों को बढ़ाकर तथा कठोर दंडों जैसे भारी जुर्माना, लंबा / आजीवन कारावास, आदि का प्रावधान करके इसके दुरुपयोग की आशंका को और बढ़ा देता है।
किसी भी न्यायालय में आज तक एक भी मामले में यह सिद्ध नहीं हुआ कि, किसी का धर्म परिवर्तन बलपूर्वक, छल या प्रलोभन से किया गया है। यास्तव में, स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन को इस प्रकार दबाया जाना संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
मौजूदा धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत शून्य दोषसिद्धि दर्शाती है कि ये अधिनियम न्याय की बजाय राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके।
कानून का इस तरह का दुरुपयोग न केवल शासन में आग जनता का विश्वास को कम करता है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 तथा 25 में निहित मूलभूत अधिकारों तथा मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (अनुच्छेद 18) और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संविदा के तहत की गई अंतर्राष्ट्रीय प्रतिवद्धताओं का भी उल्लंघन करता है, जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं।
छत्तीसगढ़ सहित 12 राज्यों के धर्म स्वातंत्र्य अधिनियमों के संबंध में याचिका माननीय सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। उपरोक्त्त के आलोक में, हम मांग करते हैं:
(क) प्रस्तावित विधेयक को अधिनियमित होने से रोकने के लिए तक्ताल वापस लिया जाए।
(ख) मौजूदा धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के प्रावधानों की व्यापक समीक्षा की जाए, ताकि उनके दुरुपयोग को रोका जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे संवैधानिक मानकों के अनुरूप हौं।
(ग) धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की जाए, जिसमें भीड़ द्वारा किए गए हमलों की स्वतंत्र जांच शामिल हो।
(घ) विभाजनकारी कानून बनाने के बजाय धार्मिक और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक और सामुदायिक प्रतिनिधियों तथा नागरिक समाज के साथ संवाद स्थापित किया जाए।
इन चिंताओं का समाधान न होने पर हम जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने और मामले को राष्ट्रीय पटल तक ले जाने के लिए विवश होंगे।
हम शांतिपूर्ण वकालत के प्रति प्रतिबद्ध हैं और शासन से देश-प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को अक्षुण बनाए रखने का विनम्र आग्रह करते हैं।
