संत कुमार नेताम के अधिवक्ता ने कहा कि वे अपनी याचिका वापस नहीं ले रहे
हाई कोर्ट ने दो सप्ताह बाद सुनवाई के लिए रखा
बिलासपुर 3 जुलाई छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में आज करीब 3 साल बाद राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पास हुए विधेयकों को रोकने वाली लंबित याचिका पर सुनवाई हुई। 2019 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ विधानसभा जिस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी के द्वारा पारित कई विधेयक राज्यपाल ने मंजूरी देने के बजाय बिना किसी निर्णय के रोक रखे हैं। तब छत्तीसगढ़ की सरकार ने पास विधेयकों को रोकने के खिलाफ और आदिवासी कार्यकर्ता संत कुमार नेताम ने विधेयकों को विशेष कर राज्य में आरक्षण बढ़ाने वाले विधेयक को रोकने के खिलाफ यह याचिका दायर की थी।
आज की सुनवाई जो जस्टिस ए के प्रसाद के सिंगल बेंच के सामने हुई, के दौरान हाई कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहां की राज्य सरकार यह याचिका वापस लेना चाहती है। और इसके लिए विधिवत आवेदन देने हेतु उसे समय चाहिए। वहीं दूसरी ओर संत कुमार नेम की ओर से उपस्थित अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले के अनुसार किसी भी विधेयक जो विधानसभा के द्वारा पास हो गया है उसे राज्यपाल बिना निर्णय के लंबे समय तक रोक नहीं सकते इसलिए वे अपनी याचिका को वापस नहीं ले रहे हैं और पास विधेयकों पर निर्णय चाहते हैं। गौरतलब है कि संत कुमार नेताम ने अपनी याचिका में छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित उस विधेयक को जिसमें आरक्षण में वृद्धि की गई है विशेष रूप से मंजूरी की मांग की है ।
सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रसाद ने राज्य सरकार को याचिका वापस लेने के लिए विधिवत आवेदन देने के लिए दो सप्ताह का समय प्रदान किया है इसके बाद इस मामले पर आगे सुनवाई की जाएगी वही नेताम के अधिवक्ता के द्वारा सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ फैसले की प्रति प्रस्तुत करने की बात कही गई है।
गौरतलब है कि 2018 से 2023 के बीच कांग्रेस की सरकार के समय पारित कई विधेयक जिनमें एक विधेयक में कुशा भाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर चंदूलाल चंद्राकार विश्वविद्यालय करना भी शामिल था को राज्यपाल के द्वारा मंजूरी नहीं दी गई थी। ऐसे मामले कई अन्य राज्यों में भी हुए थे तब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मसले को अपने हाथ में लिया था और पिछले साल सितंबर में हुई लंबी सुनवाई के बाद जो फैसला आया है उसके अनुसार याचिका कर्ताओं का पक्ष मजबूत हुआ है कि राज्यपाल विधानसभा के द्वारा पास विधेयक को असीमित काल के लिए नहीं रोक सकते बल्कि उस पर कोई ना कोई फैसला उन्हें लेना ही होगा । जिसमें पुनः विधानसभा को विचारार्थ भेजना या राष्ट्रपति महोदय को विचारार्थ भेजना शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार यदि वापस भेजे गए विधेयक को विधानसभा पुनः पास कर देती है कब राज्यपाल को उन्हें रोकने का अधिकार नहीं होगा। संविधान पीठ ने किसी राज्य में लंबे समय बीत जाने के बाद भी पास विधेयकों पर कोई फैसला न होने पर पीड़ित पक्षों को याचिका लगाने की स्वतंत्रता दी है। गौर तलब है कि जब तक विधानसभा के द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिलती तब तक वह कानून नहीं बन पाता। क्योंकि प्रजातंत्र में मूल शक्ति निर्वाचित व्यक्तियों के पास है अतः विधानसभा से पारित विधेयक को मानमाने तरीके से रोकाजाना गलत है।