
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव – 2023 से संबंधित एक बड़ा फैसला सुनाते हुए आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी – मुन्ना लाल टीपू द्वारा सीतापुर से भाजपा विधायक – राम कुमार टोप्पो एवं रिटर्निंग ऑफिसर – रवि राही के विरुद्ध दायर की गई चुनाव याचिका को आज खारिज कर दिया है ।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल ने निर्वाचन याचिका क्रमांक 01/2024 में महत्वपूर्ण निर्णय पारित करते हुए सिटापुर (अनुसूचित जनजाति) विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित चुनाव याचिका को निरस्त कर दिया है। यह आदेश दिनांक 17 अप्रैल 2026 को पारित किया गया। 
याचिकाकर्ता मुन्ना लाल टोप्पो द्वारा यह निर्वाचन याचिका प्रस्तुत की गई थी, जिसमें वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उनके नामांकन पत्र को Returning Officer द्वारा निरस्त किए जाने को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि उनका नामांकन गलत आधार पर अस्वीकृत किया गया। 
प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डॉ. जितेन्द्र किशोर मेहता एवं आनंद कुमार कुजूर ने पक्ष रखा। राज्य निर्वाचन आयोग/प्रतिवादी क्रमांक 1 से 3 की ओर से श्री राकेश कुमार झा, अधिवक्ता उपस्थित हुए। वहीं प्रतिवादी क्रमांक 4, सिटापुर क्षेत्र के निर्वाचित विधायक रामकुमार टोप्पो (भाजपा) की ओर से शरद मिश्रा, अधिवक्ता ने प्रभावी पैरवी की। 
प्रतिवादी रामकुमार टोप्पो की ओर से यह महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं अपने नाम निर्देशन पत्रों एवं शपथपत्र में यह स्पष्ट स्वीकार किया है कि उसके समुचित सरकार के साथ वर्तमान में अनुबंध विद्यमान हैं। अतः स्वयं द्वारा किए गए इस स्वीकारोक्ति के बाद याचिकाकर्ता यह नहीं कह सकता कि वह अयोग्यता से मुक्त था या उसका नामांकन गलत रूप से निरस्त किया गया।
प्रतिवादी पक्ष की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि जल जीवन मिशन के अंतर्गत प्रचलित उक्त अनुबंध प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 9A के अंतर्गत अयोग्यता का स्पष्ट आधार बनते हैं।
न्यायालय ने अभिलेखों, दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के परीक्षण के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं अपने नामांकन पत्रों तथा शपथपत्र में सरकार के साथ प्रचलित अनुबंध होने की घोषणा की थी। न्यायालय ने माना कि ऐसी स्पष्ट स्वीकारोक्ति के पश्चात याचिकाकर्ता उससे मुकर नहीं सकता।
न्यायालय ने यह भी माना कि Returning Officer द्वारा उपलब्ध अभिलेखों, विभागीय प्रतिवेदन तथा याचिकाकर्ता की स्वयं की घोषणाओं के आधार पर नामांकन पत्र निरस्त करने की कार्रवाई विधिसम्मत थी। याचिकाकर्ता यह सिद्ध नहीं कर सके कि नामांकन अनुचित रूप से निरस्त किया गया था।
अंततः उच्च न्यायालय ने निर्वाचन याचिका को निरस्त करते हुए पक्षकारों को अपना-अपना व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया। 
यह निर्णय चुनावी प्रक्रिया में नामांकन पत्र में दी गई जानकारी की सत्यता, पारदर्शिता तथा वैधानिक पात्रता के महत्व को पुनः स्थापित करता है।
